उत्तराखंड

हरेला पर्व विशेष: ‎हरियाली, स्वास्थ्य और संस्कृति का उत्सव है हरेला: डॉ. अवनीश उपाध्याय

कलयुग दर्शन (24×7)

अवधेश भूमीवाल (संवाददाता)

हरिद्वार। ‎उत्तराखंड की सांस्कृतिक पहचान और पर्यावरण चेतना का प्रतीक पर्व “हरेला” न केवल प्रकृति से प्रेम का संदेश देता है, बल्कि आयुर्वेदिक दृष्टि से यह शरीर, मन और परिवेश के संतुलन का अद्भुत अवसर भी है। यह केवल कृषि परंपरा का उत्सव नहीं, बल्कि ऋतुचर्या और देह की प्रकृति के अनुरूप जीवनशैली में बदलाव का संकेतक भी है। ‎आचार्य चरक कहते हैं: “ऋतुभिर्हि गुणा: सर्वे द्रव्याणां भावयन्त्यपि।” अर्थात हर ऋतु द्रव्यों (भोजन, औषधि) के गुणों को बदल देती है। हरेला, वर्षा ऋतु के आगमन और ग्रीष्म की अग्नि से तपे शरीर को शीतलता देने का पर्व है। ‎‎इस समय वात और पित्त दोष की वृद्धि होती है और पाचन अग्नि मंद हो जाती है। ऐसे में हरेला के अवसर पर परंपरागत रूप से खाए जाने वाले हल्के, पचने योग्य और स्निग्ध आहार, जैसे मंडुवे का रोटी, गहत की दाल, ककड़ी, लौकी, कुल्थ, झंगोरा खीर, लस्सी, और ताजे मौसमी फलों का सेवन आयुर्वेदिक दृष्टि से शरीर के दोषों को संतुलित करता है।

‎हरेला बोने की प्रक्रिया ही एक प्रकार की औषधीय ध्यान साधना है। 5 से 11 प्रकार के अनाज-गेहूं, जौ, मक्का, उड़द, तिल आदि को मिलाकर मिट्टी में बोया जाता है। यह मिश्रण ‘नवधान्य’ कहलाता है, जिसका उल्लेख काश्यप संहिता में भी है। जब ये हरे अंकुरित होते हैं, तो इन्हें देवता के रूप में पूजा जाता है और परिवार के बुजुर्गों द्वारा आशीर्वाद सहित सिर पर रखा जाता है। ‎आयुर्वेद शोध विशेषज्ञ डॉ. अवनीश उपाध्याय बताते हैं, “हरेले के अंकुर पोषक तत्वों से भरपूर होते हैं, इनमें क्लोरोफिल, एंजाइम्स, फाइबर, तथा सूक्ष्म खनिज प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं जो पाचन, त्वचा और मनोदशा सुधारने में सहायक होते हैं। इन्हें सुखाकर पाउडर बनाकर भोजन में मिलाना एक प्रकार की आयुर्वेदिक टॉनिक का काम करता है। ‎

हरेला पर्व के दौरान बच्चों और युवाओं द्वारा खेली जाने वाली परंपरागत खेल ,ये सब शरीर को सक्रिय करने वाले प्राकृतिक व्यायाम हैं। ये मानसिक और शारीरिक समन्वय को बेहतर बनाते हैं, जिसे आयुर्वेद में ‘व्यास-बल-वर्धन’ कहा गया है। ‎हरियाली लगाना केवल पर्यावरणीय कार्य नहीं, आयुर्वेद में यह “वनस्पति चिकित्सा” का हिस्सा है। नीम, तुलसी, आंवला, पीपल, अर्जुन जैसे पौधे लगाए जाते हैं, जो पंचकर्म चिकित्सा में उपयोगी हैं। डॉ. उपाध्याय के अनुसार, हरेला जीवनशैली को प्रकृति के अनुरूप लाने का काल है, जब हम अपने आसपास के वातावरण को औषधीय बनाते हैं और स्वयं भी शारीरिक एवं मानसिक रूप से अधिक सक्षम होते हैं। ‎हरेला केवल एक त्योहार नहीं, बल्कि स्वस्थ जीवन की प्रयोगशाला है, जहाँ प्रकृति, संस्कृति और चिकित्सा का अद्भुत समागम होता है। यह पर्व हमें स्मरण कराता है कि स्वास्थ्य केवल शरीर की स्थिति नहीं, बल्कि मन, पर्यावरण और समाज के साथ संतुलन में जीने की एक कला है।

[metaslider id="7337"]


[banner id="7349"]

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button