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रोज़ा रखने वालों का मर्तबा बहुत बड़ा है: इसरार सलमानी

कलयुग दर्शन (24×7)

मो नदीम (संपादक)

हरिद्वार। पूर्व पार्षद इसरार सलमानी ने कहा कि रोज़ा रखने वालों का मर्तबा बहुत बड़ा है। उन्होंने इस्लाम में रोज़े की अहमियत को रेखांकित करते हुए कहा कि यह केवल भूख-प्यास की इबादत नहीं, बल्कि आत्म-संयम, तक्वा, अल्लाह से करीब और इंसानियत की सेवा का सर्वोच्च माध्यम है। इसरार सलमानी ने कहा कि “रोज़ा रखना अल्लाह की सबसे पसंदीदा इबादतों में से एक है। कुरआन-ए-पाक में अल्लाह तआला फरमाते हैं: ‘रोज़ा मेरे लिए है और मैं ही इसका बदला दूंगा’ (हदीस कुदसी)। जो शख्स सच्चे दिल से रोज़ा रखता है, वह न सिर्फ़ गुनाहों से पाक होता है, बल्कि उसके दिल में नूर, सब्र और रहमत का सैलाब उमड़ आता है। श्री सलमानी ने कह है कि आज की भागदौड़ भरी दुनिया में जहां लोग अपनी ख्वाहिशों के गुलाम बन चुके हैं, रोज़ा रखने वाला इंसान अल्लाह का सच्चा बंदा बनकर उभरता है। उसका मर्तबा इतना बुलंद है कि फरिश्ते भी उसकी इबादत पर दुआएं करते हैं।” श्री सलमानी मे कहा कि “रोज़ेदार का हर लम्हा अल्लाह की रज़ा के लिए होता है। सुबह से शाम तक भूख, प्यास, गुस्सा, झूठ, और हर तरह की बुराई से बचना यही असली रोज़ा है। जो लोग सिर्फ़ मुंह बंद रखते हैं लेकिन दिल और ज़बान से गुनाह करते हैं, उनका रोज़ा पूरा नहीं होता। सच्चा रोज़ेदार वही है जो रोज़े के दौरान और रोज़े के बाद भी नेकी पर कायम रहता है। ऐसे लोगों का मर्तबा जन्नत में बहुत ऊँचा होगा। अल्लाह के नबी ﷺ ने फरमाया: ‘जो शख्स एक दिन भी अल्लाह की राह में रोज़ा रखे, अल्लाह उससे जहन्नम की सात खाइयों की दूरी कर देता है।’”

श्री सलमानी ने समाज के विभिन्न वर्गों से अपील की युवाओं से कहा कि रोज़ा सिर्फ बुजुर्गों की इबादत नहीं, बल्कि युवा पीढ़ी के लिए सबसे बड़ा सबक है। अनुशासन, धैर्य और खुद पर काबू पाने का। श्री सलमानी ने कहा कि “रोज़ा सिर्फ रमज़ान तक सीमित नहीं। नफ्ल रोज़े, सोमवार-गुरुवार के रोज़े, अरफा का रोज़ा, आशूरा का रोज़ा – ये सब अल्लाह की क़ुर्बत हासिल करने के ज़रिए हैं। जो लोग इन मौकों को गंवाते हैं, वे अल्लाह की रहमत से महरूम रह जाते हैं।” इसरार सलमानी ने दुआ की- “ऐ मेरे रब! उन सब रोज़ेदारों को तौफीक दे जो तेरी राह में रोज़ा रखना चाहते हैं। उनके रोज़ों को कबूल फरमा, उनके गुनाह माफ कर, उनके दिलों को सुकून दे और उन्हें जन्नत-उल-फिरदौस में ऊँचे मकाम अता फरमा। आमीन।

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