इंसानियत की मिसाल “लावारिसों की वारिस” क्रांतिकारी शालू सैनी ने फिर निभाया का फर्ज, अज्ञात शव की बहन बनकर दी सम्मानजनक अंतिम विदाई

कलयुग दर्शन (24×7)
दीपक झा (संवाददाता)
रुड़की। मानवता की मिशाल बनने वाली “लावारिसों की वारिस” के नाम से पहचानी जाने वाली मुजफ्फरनगर निवासी क्रांतिकारी शालू सैनी ने एक बार फिर अज्ञात शव का अंतिम संस्कार कर उसे सम्मानपूर्वक विदाई दी। थाना ककरौली क्षेत्र से पुलिस कर्मियों द्वारा सूचना मिलते ही शालू सैनी बिना देर किए मौके पर पहुंचीं और मृतक को अपना भाई मानते हुए पूरे विधि-विधान से अंतिम संस्कार किया। थाना ककरौली पुलिस को एक अज्ञात शव मिलने की सूचना प्राप्त हुई थी। पहचान न हो पाने के कारण शव लावारिस की श्रेणी में आ रहा था,ऐसे में पुलिस ने क्रांतिकारी शालू सैनी से संपर्क किया। सूचना मिलते ही वह मौके पर पहुंचीं और मृतक को अपना नाम देकर उसकी बहन बनकर अंतिम संस्कार की सभी जिम्मेदारियां स्वयं संभालीं। शमशान घाट पर उपस्थित लोगों की आंखें उस समय नम हो गईं, जब शालू सैनी ने मृतक को भाई मानकर अंतिम विदाई दी। उन्होंने कहा कि। कोई भी इंसान इस दुनिया से बेनाम और बेसहारा न जाए, यही मेरा प्रयास है। जब तक सांस है, तब तक इस सेवा कार्य को जारी रखूंगी।

गौरतलब है कि शालू सैनी पिछले कई वर्षों से हिंदू, मुस्लिम, सिख और ईसाई समेत लगभग सभी धर्मों के लावारिस व बेसहारा शवों का उनके धर्म के रीति-रिवाजों के अनुसार अंतिम संस्कार करती आ रही हैं और अब तक करीब छः हजार से अधिक अंतिम संस्कार व अस्थि विसर्जन वो अपने हाथों से कर चुकी हैं। समाज में जहां लोग अपने रिश्तों से मुंह मोड़ लेते हैं, वहीं क्रांतिकारी शालू सैनी जैसे लोग मानवता की नई परिभाषा गढ़ रहे हैं। पूरे देश में उनके इस सेवाभाव की सर्वत्र सराहना हो रही है। स्थानीय लोगों का कहना है कि ऐसे कार्य समाज को जोड़ने और इंसानियत को जीवित रखने का संदेश देते हैं। पुलिस प्रशासन ने भी उनके सहयोग और संवेदनशीलता की प्रशंसा की है। आज के दौर में जब रिश्ते स्वार्थ के तराजू पर तौले जाते हैं, वहां क्रांतिकारी शालू सैनी का यह कदम साबित करता है कि मानवता अभी जिंदा है और जब तक ऐसे लोग समाज में हैं, कोई भी लावारिस नहीं नहीं जाएगा।उन्होंने जनता से अपील भी की है कि अंतिम संस्कार की सेवा में उनकी मदद जरूर करे ताकि हर मृतक को लगा नसीब हो सके।



