उत्तर प्रदेश

परिवार, समाज और फिर हमारी सरकार जिम्मेदार, बढते नशाखोरी की लत में लागातार तेजी से वृद्धि

परिवार, समाज और प्रशासन को एकजुटता दिखाते हुए साकारात्मक दिशा में काम करने की सख्त जरूरत

कलयुग दर्शन (24×7)

अबलीश कुमार (सहारनपुर संवाददाता)

सहारनपुर। आज हमारे देश के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वो शहरी एवं ग्रामीण इलाकों के बच्चों में तेजी से बढ़ रही नशे की लत से कैसे निजात पाए। अगर देखा जाय तो पिछले कुछ सालों में अट्ठारह साल से कम उम्र के बच्चों में नशाखोरी की लत में तेजी से इजाफा हुआ है। दिल्ली, मुंबई जैसे शहरों में तो मासूमो के अंदर बढते नशाखोरी की लत में लागातार तेजी से वृद्धि होती जा रही है। एक आंकड़े में ऐसा बताया गया है कि आर्थिक पृष्ठभूमि के आधार पर उच्च,मध्यम एवं निम्न वर्ग में बंटे भारतीय समाज के उच्च एवं निम्न वर्ग के बच्चे सर्वाधिक नशे की चपेट में आ रहे है। इस मामले में मध्यम वर्ग के परिवारों से आने वाले बच्चों की स्थिति थोड़ी बेहतर कही जा सकती है। नजीर के तौर पर अगर दिल्ली को ही लें तो यहाँ के फुटपाथों पर जीवन बसर कर रहे निम्नोत्तर श्रेणी के गरीब परिवारों के बच्चे खुलेआम नशे का सेवन करते किसी भी इलाके में आसानी से दिख सकते हैं तो वहीँ उच्च परिवारों के बच्चे भी हाई प्रोफाइल नशाखोरी के शिकार हैं।वैसे निम्न वर्ग के बच्चों के नशाखोरी का अड्डा पब और बार न होकर सार्वजनिक शौचालय एवं बस अड्डा आदि होते हैं। अगर बुनियादी तौर पर देखा जाय तो बड़ा सवाल ये उठता है कि क्या उच्च परिवारों के बच्चों में विकसित हो रही नशाखोरी की लत को भी और फुटपाथ पर जीवन बसर कर रहे बच्चों की नशाखोरी की लत को एक नजरिये से देखने की जरुरत है? सवाल ये भी है कि क्या दोनों तरह के मामलों में समस्या की जड और उसका समाधान एक ही होगा? समाज में बच्चों के अंदर बढ़ती नशे की प्रवृति का अगर बारीकी से अध्यन किया जाय तो कई ऐसे कारण नजर आयेंगे जिनके लिए अलग-अलग स्तरों पर परिवार, समाज और फिर हमारी सरकार जिम्मेदार नजर आयेगी।

इस मामले में परिवार की जिम्मेदारी को नाकारा नहीं जा सकता है। उच्च वर्ग के परिवारों से आने वाले बच्चों में बढ़ती नशे की लत की वजह तो कहीं ना कहीं उन परिवारों के गैर-जिम्मेदारना परवरिश को भी माना जाना चाहिए। लेकिन निम्न वर्ग के गरीब और अशिक्षित परिवारों के बच्चों के लिए ये वजह ज्यादा पुख्ता नजर नहीं आती। इस मामले में बाल मनोविज्ञान पर अध्यन कर रहे मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि फुटपाथ पर जीवन बसर कर रहे परिवारों में पारिवारिक दायित्व के निर्वहन का अभाव स्वाभाविक होता है और वो अपने बच्चों को बहुत जल्दी खुद का भरण-पोषण करने के लिए उत्तरदायी मान लेते हैं। फुटपाथों पर भीख मांगते छोटे-छोटे बच्चों की बहुतायत संख्या इस बात का उदाहरण भी है। निश्चित तौर पर जब पारिवारिक दायित्वों का अभाव होगा और बच्चों को बालिग़ होने से पहले ही भूख से जुड़ी आत्मनिर्भरता के दलदल में धकेला जाएगा तो उनके अंदर बुरी प्रवृतियों का विकास होना स्वाभाविक है। ऐसा भी माना जाता है कि भूख और ठण्ड की पीड़ा से खुद को बचाने के लिए किया गया नशा भी गरीब बच्चों में बढ़ती नशाखोरी का एक बड़ा कारण हैं. इस मामले में मध्यम वर्ग की स्थिति कुछ बेहतर इस वजह से है क्योंकि वहाँ पारिवारिक दायित्वों का निर्वहन सर्वाधिक देखा जाता है। बच्चों में बढ़ती नशाखोरी के लिए समाज को भी कटघरे में खड़ा करना गलत नहीं प्रतीत होता है। कहीं ना कहीं समाज भी अपने दायित्वों से विन्मुख होकर नशाखोरी की प्रवृति को बढ़ावा देने का काम कर रहा है।ऐसा कहना गलत नहीं प्रतीत होता कि आत्मसुधार की बजाय समाज में गलत प्रवृतियाँ विकसित होती जा रही हैं और समाज मूक दर्शक की तरह खड़ा अपने दायित्वों से मुख मोड़कर खड़ा नजर आ रहा है।

नशाखोरी के मामले में अगर देखा जाय तो नाममात्र के सामाजिक जागरूकता अभियान भी चलाये जा रहे हैं। हलाकि सोशल मीडिया पर भी “नो टोबैको” जैसे कुछ अभियान हैं जो सक्रिय रूप से चल रहे हैं मगर वो अकेले काफी नहीं हैं इस बड़ी समस्या के प्रति जागरूकता लाने में। इन सबके बाद अगर बच्चों में बढ़ती नशे की लत के प्रति सरकार और प्रशासन द्वारा किये जा रहे उपायों पर नजर डालें तो मामला और भी लचर नजर आता है।कानूनी तौर पर हम इस मामले में हम चाहें जितने सख्त हों लेकिन उन कानूनों को लागू करने के मामले में हमारी स्थिति ढाक के तीन पात से ज्यादा कुछ भी नहीं दिख रही। चाहें सार्वजनिक स्थलों पर धूम्रपान पर रोक का मामला हो अथवा कम उम्र के बच्चों द्वारा नशीले पदार्थों के विक्री का मामला हो,हर मोर्चे पर हम अपने कानूनों को लागू कर पाने में नाकाम साबित हुए है। निश्चित तौर पर यह हमारे समाज और देश के भविष्य के लिए बेहद चिंतापूर्ण मसला है जिसपर परिवार, समाज और प्रशासन को एकजुटता दिखाते हुए साकारात्मक दिशा में काम करने की सख्त जरूरत है। नशे के चंगुल में जिसतरह से हमारे नौनिहाल फंसते जा रहे हैं वो स्वास्थ्य, अपराध और सामाजिक असंतुलन जैसी कई समस्याओं कि जड़ बनता जा रहा है। आज अगर इस समस्या पर सचेत होते हुए हम इसे रोकने की दिशा में पहल नहीं किये तो हमारा कल बेहद कुरूप होगा और उस कुरूपता वाले कल का जिम्मेदार कोई और नहीं बल्कि हम ही होंगे।नशीले पदार्थों को बनाने वाली कंपनियों एवं उनके विक्रेताओं पर भी नकेल कसना निहायत जरूरी है।

[metaslider id="7337"]


[banner id="7349"]

Related Articles

Back to top button