उत्तराखंड

कांवड़ यात्रा आस्था के साथ अनुशासन और मर्यादा का भी पर्व: पं. अधीर कौशिक

कलयुग दर्शन (24×7)

दीपक झा (संवाददाता)

हरिद्वार। श्री अखंड परशुराम अखाड़े के पंडित अधीर कौशिक ने श्रावण मास में शुरू होने वाली कांवड़ यात्रा को लेकर शिवभक्तों के लिए आवश्यक धार्मिक नियमों और मर्यादाओं की जानकारी दी। पत्रकारों से बातचीत में उन्होंने कहा कि कांवड़ यात्रा केवल आस्था का पर्व नहीं, बल्कि अनुशासन, पवित्रता और सनातन परंपराओं के पालन का भी प्रतीक है। उन्होंने सभी शिवभक्तों से नियमों का पालन करते हुए श्रद्धा और भक्ति के साथ यात्रा पूरी करने की अपील की। पं. अधीर कौशिक ने बताया कि कांवड़ यात्रा पर निकलते समय घर से बहन के हाथों तिलक और आरती कराकर तथा बड़ों का आशीर्वाद लेकर प्रस्थान करना शुभ माना जाता है। हरिद्वार पहुंचने पर सबसे पहले मां गंगा को प्रणाम कर अपने उद्देश्य का संकल्प लें और उसके बाद गंगाजल कांवड़ में स्थापित करें। उन्होंने कहा कि कांवड़ उठाने के बाद यदि रास्ते में लघुशंका करनी पड़े तो हाथ, पैर और मुंह धोने के बाद ही कांवड़ उठानी चाहिए। यदि शौच के लिए जाना पड़े तो स्नान कर धूप-दीप अर्पित करने के बाद ही दोबारा कांवड़ उठाएं। यात्रा के दौरान किसी भी प्रकार का नशा पूरी तरह वर्जित है। उन्होंने श्रद्धालुओं से केवल शुद्ध सात्विक (वैष्णव) भोजन करने की अपील करते हुए कहा कि जहां भी भंडारे में प्रसाद ग्रहण करें, वहां अपनी श्रद्धानुसार दान अवश्य दें।

साथ ही कांवड़ को गुलर के पेड़ के नीचे से नहीं ले जाना चाहिए। पं. अधीर कौशिक ने बताया कि जलाभिषेक के बाद घर लौटने पर बहन से आरती कराकर और उसे नेग देकर ही घर में प्रवेश करें। कांवड़ खोलने से पहले भगवान सत्यनारायण की कथा कराएं तथा बहन या किसी कन्या के हाथों कांवड़ का पहला धागा खुलवाएं। उन्होंने कहा कि कांवड़ यात्रा के दौरान देवी-देवताओं का स्वरूप धारण कर फिल्मी गीतों पर नृत्य करना धार्मिक दृष्टि से अनुचित है। उन्होंने श्रद्धालुओं से सनातन समाज से जुड़े व्यापारियों से ही कांवड़ सामग्री खरीदने, राष्ट्रीय ध्वज का सम्मान बनाए रखने तथा कांवड़ पर भगवा ध्वज लगाकर सनातन संस्कृति की पहचान को मजबूत करने की अपील की। साथ ही ताजिये के स्वरूप जैसी बड़ी कांवड़ न बनाने का भी आग्रह किया। उन्होंने कहा कि कांवड़ यात्रा भगवान शिव के भजनों, ‘बम-बम भोले’ के जयघोष, पूर्ण श्रद्धा, अनुशासन और मर्यादा के साथ संपन्न की जानी चाहिए। इससे यात्रा का आध्यात्मिक महत्व और पुण्य दोनों बढ़ते हैं। इस अवसर पर आचार्य पवन शास्त्री, आचार्य विष्णु शास्त्री, स्वामी रुद्रानंद, स्वामी कार्तिक गिरी, ऋषि शर्मा एवं दिनेश बाली सहित अन्य श्रद्धालु उपस्थित रहे।

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