गंगा तट पर गूंजा सनातन एकता का शंखनाद, सूफी सुरों में दिखी सनातन संस्कृति की झलक
कांवड़ मेले की सकुशल पूर्णता के लिए मां मनसा देवी की विशेष पूजा, संतों ने दिया एकजुटता का मंत्र

कलयुग दर्शन (24×7)
राकेश वालिया (ब्यूरो चीफ)
हरिद्वार। धर्म की राजधानी तीर्थनगरी हरिद्वार में मां गंगा के पावन तट स्थित मां मनसा देवी की चरण पादुका स्थल पर कांवड़ मेले को सकुशल एवं निर्विघ्न संपन्न कराने के लिए विशेष धार्मिक आयोजन किया गया। अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष श्रीमहंत डॉ. रविंद्र पुरी महाराज के नेतृत्व में मां मनसा देवी की विशेष पूजा-अर्चना के पश्चात भव्य संत सम्मेलन आयोजित हुआ। सम्मेलन में देशभर से आए संत-महात्माओं ने सनातन संस्कृति की एकता, संरक्षण और संवर्धन को लेकर मंथन किया। सम्मेलन का सबसे भावपूर्ण और आकर्षक क्षण उस समय आया, जब पंजाब के प्रसिद्ध सूफी संत शमशेर सिंह लहरी ने अपने सूफी गायन और भजनों के माध्यम से सनातन संस्कृति की आध्यात्मिक झलक प्रस्तुत की। उनके भजनों की स्वर लहरियों ने संत समाज को भावविभोर कर दिया और पूरा वातावरण भक्ति एवं आध्यात्मिक ऊर्जा से भर उठा। प्रस्तुति के पश्चात संत शमशेर सिंह लहरी का माल्यार्पण कर तथा मां की चुनरी ओढ़ाकर सम्मान किया गया।
“सनातन की शक्ति उसकी एकता में है”- श्रीमहंत डॉ. रविंद्र पुरी महाराज
अखाड़ा परिषद अध्यक्ष श्रीमहंत डॉ. रविंद्र पुरी महाराज ने कहा कि सनातन केवल कोई पंथ या परंपरा नहीं, बल्कि भारत की आत्मा है। आज आवश्यकता है कि सनातन समाज छोटे-छोटे मतभेदों से ऊपर उठकर अपनी संस्कृति, संत परंपरा और धर्म की रक्षा के लिए एकजुट हो। उन्होंने कहा कि संत समाज का दायित्व केवल धर्म का प्रचार करना नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों तक सनातन संस्कारों को सुरक्षित पहुंचाना भी है।

श्रीमहंत राम रतन गिरि- “एकता ही सनातन की सबसे बड़ी शक्ति”
श्रीमहंत राम रतन गिरि ने कहा कि सनातन संस्कृति ने सदैव समस्त मानवता को जोड़ने का संदेश दिया है। आज आवश्यकता है कि सनातनी अपने भीतर के छोटे-छोटे भेद भूलकर संस्कृति और धर्म की रक्षा के लिए एक मंच पर खड़े हों। उन्होंने कहा कि जब सनातन समाज एकजुट होगा, तभी उसकी आध्यात्मिक और सांस्कृतिक शक्ति और अधिक प्रभावी होगी।
महामंडलेश्वर स्वामी संतोषानंद- “संस्कार बचेंगे तो सनातन बचेगा”
महामंडलेश्वर स्वामी संतोषानंद ने कहा कि सनातन संस्कृति की वास्तविक शक्ति उसके संस्कारों में है। परिवार, गुरु, माता-पिता, गौ, गंगा और संत परंपरा के प्रति श्रद्धा को नई पीढ़ी तक पहुंचाना आज सबसे बड़ी आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि धर्म की जड़ें तभी मजबूत रहेंगी, जब युवा पीढ़ी अपनी संस्कृति को समझेगी और उस पर गर्व करेगी।

स्वामी आनंद स्वरूप- “धर्म की रक्षा के लिए जागरण जरूरी”
स्वामी आनंद स्वरूप ने कहा कि सनातन संस्कृति किसी के विरोध की संस्कृति नहीं, बल्कि सत्य, करुणा, सेवा और मानव कल्याण की संस्कृति है। उन्होंने कहा कि समाज में धार्मिक चेतना और सांस्कृतिक जागरण जितना मजबूत होगा, उतना ही सनातन का भविष्य सुरक्षित होगा।
स्वामी ललितानंद गिरि- “मंदिरों के साथ संस्कारों की भी रक्षा हो”
स्वामी ललितानंद गिरि ने कहा कि सनातन संस्कृति केवल मंदिरों और धार्मिक आयोजनों तक सीमित नहीं है। यह हमारे आचरण, परिवार, संस्कार, सेवा और जीवन पद्धति में बसती है। इसलिए सनातन की रक्षा के लिए समाज को अपने संस्कारों और परंपराओं को मजबूत करना होगा।
सूफी सुरों में सनातन का संदेश
पंजाब के सूफी संत शमशेर सिंह लहरी ने कहा कि भारत की आध्यात्मिक परंपरा प्रेम, भक्ति और मानवता को जोड़ने वाली रही है। उनके सूफी भजनों ने संत सम्मेलन में धर्म की उस साझा आध्यात्मिक चेतना को स्वर दिया, जिसमें भक्ति की कोई सीमा नहीं होती।
संत सम्मेलन में महामंडलेश्वरों और श्रीमहंतों ने एक स्वर में कहा कि सनातन संस्कृति को बांटने वाली संकीर्णताओं से ऊपर उठकर उसकी मूल भावना- एकता, सेवा, संस्कार और धर्मनिष्ठा- को मजबूत करना समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है।

इस अवसर पर संत समाज ने मां गंगा और मां मनसा देवी से कांवड़ मेले के निर्विघ्न एवं सकुशल संपन्न होने की प्रार्थना की।
संतों का सनातन संदेश
“धर्मो रक्षति रक्षितः।”
अर्थात- जो धर्म की रक्षा करता है, धर्म उसकी रक्षा करता है।
गंगा की अविरल धारा और संतों की वाणी के बीच हरिद्वार से निकला यह संदेश साफ था- सनातन की शक्ति किसी एक व्यक्ति में नहीं, बल्कि करोड़ों सनातनियों की आस्था, संस्कार और एकता में है।



