गढ़भोज में दिखी उत्तराखंड की समृद्ध लोकसंस्कृति और पारंपरिक खान-पान की झलक

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राकेश वालिया (ब्यूरो चीफ)
हरिद्वार। एसएमजेएन पीजी कॉलेज, हरिद्वार में उत्तराखंड की समृद्ध लोकसंस्कृति, पारंपरिक खान-पान और स्थानीय अनाजों के संरक्षण एवं संवर्धन के उद्देश्य से गढ़भोज कार्यक्रम का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में महाविद्यालय प्रबंधन समिति के अध्यक्ष एवं अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष श्रीमहन्त डॉ. रविन्द्र पुरी जी महाराज मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित रहे। इस अवसर पर उत्तराखंड संस्कृत विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति प्रो. दिनेश चन्द्र शास्त्री, वरिष्ठ पत्रकार संदीप रावत सहित अनेक गणमान्य अतिथि, प्राध्यापक, कर्मचारी एवं बड़ी संख्या में विद्यार्थी उपस्थित रहे। कार्यक्रम में विद्यार्थियों ने मंडुवा, झंगोरा, भट्ट, गहत सहित स्थानीय अनाजों एवं दालों से तैयार विभिन्न पारंपरिक और पौष्टिक व्यंजनों की आकर्षक प्रस्तुति दी। विद्यार्थियों ने व्यंजनों के निर्माण, उनके स्थानीय महत्व और पौष्टिक गुणों की जानकारी भी दी। मुख्य अतिथि श्रीमहन्त डॉ. रविन्द्र पुरी जी महाराज ने कहा कि उत्तराखंड की पहचान प्राकृतिक सौंदर्य के साथ-साथ उसकी समृद्ध लोकसंस्कृति, परंपराओं और पारंपरिक खान-पान से भी है। स्थानीय जलवायु और भौगोलिक परिस्थितियों के अनुरूप हमारे पूर्वजों ने ऐसी खाद्य परंपरा विकसित की, जो पौष्टिक एवं स्वास्थ्यवर्धक है। गढ़भोज केवल भोजन नहीं, बल्कि उत्तराखंड की संस्कृति, संस्कार और जीवन-पद्धति का प्रतिबिंब है। उन्होंने विद्यार्थियों से स्थानीय अनाजों और पारंपरिक व्यंजनों को जीवन में स्थान देने तथा इनके संरक्षण एवं प्रचार-प्रसार में योगदान देने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि स्थानीय उत्पादों को बढ़ावा देने से किसानों और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी मजबूती मिलेगी।

पूर्व कुलपति प्रो. दिनेश चन्द्र शास्त्री ने कहा कि भारतीय परंपरा में भोजन को स्वस्थ जीवन और संस्कारों का महत्वपूर्ण आधार माना गया है। मंडुवा, झंगोरा, भट्ट और गहत जैसे स्थानीय अनाज एवं दालें हमारी कृषि, खाद्य परंपरा और स्थानीय ज्ञान की महत्वपूर्ण धरोहर हैं। इनके संरक्षण से स्थानीय ज्ञान, कृषि परंपरा और सांस्कृतिक विरासत भी सुरक्षित होगी। उन्होंने विद्यार्थियों से लोकपरंपराओं का अध्ययन कर उन्हें वैज्ञानिक दृष्टिकोण से समझने का आह्वान किया। वरिष्ठ पत्रकार संदीप रावत ने कहा कि उत्तराखंड की लोकसंस्कृति केवल लोकगीतों और लोकनृत्यों तक सीमित नहीं है, बल्कि पारंपरिक भोजन में भी यहां की जीवनशैली और सामाजिक इतिहास दिखाई देता है। उन्होंने कहा कि आधुनिकता को अपनाने के साथ अपनी जड़ों और परंपराओं से जुड़े रहना भी जरूरी है। महाविद्यालय के प्राचार्य प्रो. डॉ. सुनील कुमार बत्रा ने कहा कि पारंपरिक खान-पान उत्तराखंड की सांस्कृतिक विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा है। गढ़भोज जैसे कार्यक्रम विद्यार्थियों को स्थानीय उत्पादों, पारंपरिक ज्ञान, स्वस्थ जीवनशैली और सांस्कृतिक विरासत से जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। उन्होंने कार्यक्रम के आयोजन के लिए महाविद्यालय परिवार, आयोजकों एवं विद्यार्थियों को शुभकामनाएं दीं। गढ़भोज प्रतियोगिता में बीएससी की छात्रा सोनाली, वंशिका और माही को संयुक्त रूप से प्रथम पुरस्कार मिला। बीएससी की संगीता भट्ट, मीनाक्षी, शिल्पी, अंकिता, दिव्यांशी एवं प्रिया ने संयुक्त रूप से द्वितीय पुरस्कार प्राप्त किया।

कशिश रावत, नेहा जोशी एवं स्वीटी रानी को संयुक्त रूप से तृतीय पुरस्कार मिला। बीए की छात्रा खुशी, रिमझिम, नीशू तथा बीकॉम की आस्था और आयुषी को सांत्वना पुरस्कार प्रदान किया गया। कार्यक्रम के अंत में अधिष्ठाता छात्र कल्याण डॉ. संजय माहेश्वरी ने सभी अतिथियों के प्रति आभार व्यक्त किया। उन्होंने कार्यक्रम के सफल आयोजन के लिए संयोजक मंडल की डॉ. पूर्णिमा सुन्दरियाल, डॉ. गीता शाह, डॉ. सरोज शर्मा एवं श्री पंकज भट्ट को धन्यवाद दिया। उन्होंने विद्यार्थियों द्वारा पारंपरिक व्यंजनों की प्रस्तुति की सराहना करते हुए कहा कि महाविद्यालय भविष्य में भी ऐसे आयोजनों के माध्यम से विद्यार्थियों को भारतीय संस्कृति, उत्तराखंड की लोकपरंपराओं, स्वस्थ जीवनशैली और सामाजिक उत्तरदायित्व से जोड़ने के प्रयास जारी रखेगा। इस अवसर पर डॉ. शिवकुमार चौहान, डॉ. मनोज कुमार सोही, डॉ. मोना शर्मा, डॉ. लता शर्मा, वैभव बत्रा, डॉ. विजय शर्मा, डॉ. हरीश जोशी, कार्यालय अधीक्षक मोहन चन्द्र पाण्डेय सहित अनेक विद्यार्थी उपस्थित रहे।



